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गांधी को गोली मार दी गई, उनका शरीर मर गया लेकिन गांधी नाम की जिस आभा ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जनसाधारण के हृदय में आकार लिया था, वह न मर सकी। वह आज तक जीवित है और सक्रिय भी। यह किताब इसी पहेली को सुलझाने की कोशिश करती है कि वह क्या चीज थी जो गोलियों से भी बच निकली और गोलियों के पीछे खड़ी नफरत की मानव-विरोधी आँधी को आज तक चकमा देती आ रही है। लेखक के मन में इस किताब के बीज उस समय पड़े जब वे संघ की शाला में पढ़ने गए थे। यहाँ आकर उन्हें गांधी के विषय में वह सुनने को मिला जो उनके अब तक के सीखे हुए से एकदम उलट था। घर-परिवार और समाज में उन्हें गांधी का आदर करना सिखाया गया था, और शाला में उन्होंने देखा कि गांधी का मजाक उड़ाया जाता है। उन्हें कायर, कमजोर और व्यभिचारी कहा जाता है। होश सँभालने के बाद से अब तक जिसे वे नायक मानते रहे थे, यहाँ उन्हें खलनायक बताया जा रहा था। यहीं से उन्होंने गांधी को जानने का निश्चय किया। उन्होंने उनकी आत्मकथा पढ़ी और हैरान हुए कि कैसे कोई व्यक्ति प्रसिद्धि और लोकप्रियता के शिखर पर जाकर अपने बारे में वह लिख सकता है जो गांधी ने लिखा। उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास को पढ़ा और जाना कि स्वतंत्रता की अवधारणा को देश के अन्तिम व्यक्ति से जोड़ने का चमत्कार गांधी ने कैसे किया; कैसे उन्होंने धर्म के अनुशासन को दूसरों के बजाय अपनी तरफ मोड़कर धर्म के अर्थ ही बदल दिए। यह पुस्तक गांधी के जीवन और स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास पर बराबर नजर रखते हुए हमें बताती है कि गांधी हमारे आज और आनेवाले समय के लिए क्यों जरूरी हैं; और यह भी कि उनके विचारों की दीप्ति को समाप्त करना सम्भव भी नहीं है।

About the Author

चन्द्रकान्त वानखेड़े चन्द्रकान्त वानखेड़े का जन्म 15 अक्टूबर, 1951 को हुआ। वे महाराष्ट्र के साहित्य और पत्रकारिता जगत का जाना-पहचाना नाम हैं। 1971 के दौरान वे जेपी द्वारा स्थापित ‘तरुण शान्ति सेना’ के सक्रिय सदस्य रहे। बाद में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी, महाराष्ट्र के संयोजक भी रहे। उन्होंने विभिन्न विषयों पर किताबें लिखी हैं। उनकी आत्मकथा ‘आपुलाचीवाद आपणासी’ को ‘महाराष्ट्र राज्य शासन पुरस्कार’, ‘पद्मश्री विखे पाटिल पुरस्कार’, ‘विदर्भ साहित्य संघ पुरस्कार’ आदि कई पुरस्कार मिल चुके हैं। इसकी कई आवृत्तियाँ भी प्रकाशित हुई हैं। उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तकें हैं—‘पुनर्विचार’, ‘एका साध्या सत्त्यासाठी’, ‘गांधी का मरत नाही’। ‘गांधी का मरत नाही’ पुस्तक ‘गांधी क्यों नहीं मरते!’ नाम से अनूदित है। वे महाराष्ट्र के चर्चित अखबार ‘सकाल’ के सम्पादक रहे। और भी कई अखबारों के साथ जुड़े रहे। फिलहाल लेखन कार्य में सक्रिय हैं।
9789391950798
out of stock INR 179
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Gandhi Kyon Nahi Marte!

Gandhi Kyon Nahi Marte!

ISBN: 9789391950798
₹179
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Details
  • ISBN: 9789391950798
  • Author: Chandrakant Wankhede
  • Publisher: Radakrishna Prakasha
  • Pages: 150
  • Format: Paperback
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Book Description

गांधी को गोली मार दी गई, उनका शरीर मर गया लेकिन गांधी नाम की जिस आभा ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जनसाधारण के हृदय में आकार लिया था, वह न मर सकी। वह आज तक जीवित है और सक्रिय भी। यह किताब इसी पहेली को सुलझाने की कोशिश करती है कि वह क्या चीज थी जो गोलियों से भी बच निकली और गोलियों के पीछे खड़ी नफरत की मानव-विरोधी आँधी को आज तक चकमा देती आ रही है। लेखक के मन में इस किताब के बीज उस समय पड़े जब वे संघ की शाला में पढ़ने गए थे। यहाँ आकर उन्हें गांधी के विषय में वह सुनने को मिला जो उनके अब तक के सीखे हुए से एकदम उलट था। घर-परिवार और समाज में उन्हें गांधी का आदर करना सिखाया गया था, और शाला में उन्होंने देखा कि गांधी का मजाक उड़ाया जाता है। उन्हें कायर, कमजोर और व्यभिचारी कहा जाता है। होश सँभालने के बाद से अब तक जिसे वे नायक मानते रहे थे, यहाँ उन्हें खलनायक बताया जा रहा था। यहीं से उन्होंने गांधी को जानने का निश्चय किया। उन्होंने उनकी आत्मकथा पढ़ी और हैरान हुए कि कैसे कोई व्यक्ति प्रसिद्धि और लोकप्रियता के शिखर पर जाकर अपने बारे में वह लिख सकता है जो गांधी ने लिखा। उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास को पढ़ा और जाना कि स्वतंत्रता की अवधारणा को देश के अन्तिम व्यक्ति से जोड़ने का चमत्कार गांधी ने कैसे किया; कैसे उन्होंने धर्म के अनुशासन को दूसरों के बजाय अपनी तरफ मोड़कर धर्म के अर्थ ही बदल दिए। यह पुस्तक गांधी के जीवन और स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास पर बराबर नजर रखते हुए हमें बताती है कि गांधी हमारे आज और आनेवाले समय के लिए क्यों जरूरी हैं; और यह भी कि उनके विचारों की दीप्ति को समाप्त करना सम्भव भी नहीं है।

About the Author

चन्द्रकान्त वानखेड़े चन्द्रकान्त वानखेड़े का जन्म 15 अक्टूबर, 1951 को हुआ। वे महाराष्ट्र के साहित्य और पत्रकारिता जगत का जाना-पहचाना नाम हैं। 1971 के दौरान वे जेपी द्वारा स्थापित ‘तरुण शान्ति सेना’ के सक्रिय सदस्य रहे। बाद में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी, महाराष्ट्र के संयोजक भी रहे। उन्होंने विभिन्न विषयों पर किताबें लिखी हैं। उनकी आत्मकथा ‘आपुलाचीवाद आपणासी’ को ‘महाराष्ट्र राज्य शासन पुरस्कार’, ‘पद्मश्री विखे पाटिल पुरस्कार’, ‘विदर्भ साहित्य संघ पुरस्कार’ आदि कई पुरस्कार मिल चुके हैं। इसकी कई आवृत्तियाँ भी प्रकाशित हुई हैं। उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तकें हैं—‘पुनर्विचार’, ‘एका साध्या सत्त्यासाठी’, ‘गांधी का मरत नाही’। ‘गांधी का मरत नाही’ पुस्तक ‘गांधी क्यों नहीं मरते!’ नाम से अनूदित है। वे महाराष्ट्र के चर्चित अखबार ‘सकाल’ के सम्पादक रहे। और भी कई अखबारों के साथ जुड़े रहे। फिलहाल लेखन कार्य में सक्रिय हैं।

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