क्या कोई बीमारी, वह भी कैन्सर, किसी व्यक्ति के जो इस बीमारी से जूझ रहा है, और उसके परिचारकों, विशेषकर उसके माता- पिता के आत्म-विकास को बढ़ा सकती है?
स्वास्थ्य की महत्ता हमें अक्सर तभी समझ आती है जब हम उसे खो देते हैं। परंतु, इस खोए हुए ‘मित्र’ को वापस पाने की कठिन यात्रा भी हमें आत्मावलोकन, आत्म-परिवेक्षण और प्रतिदान के असंख्य अवसर प्रदान कर सकता है।
समय के साथ हमें यह आभास हुआ कि कैन्सर से जूझ रहे किसी व्यक्ति के अथक प्रयासों को स्वस्थ हो जाने या पूरी तरह ठीक हो जाने की सामान्य परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता। आम तौर पर यह सोच हमारे अपने समाज से और दुर्भाग्यवश कई बार स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों से आती है, जब वे एक सीमा के आगे अपनी क्षमताओं में असमर्थ हो जाते हैं और आप को लगता है जैसे आप अवांछित हो गए हों और त्याग दिए गए हों। ऐसे अनेक नकारात्मक विचार और व्यवहार धीरे -धीरे मरीज़ और उसके अपनों के मन में घर कर जाते हैं, जहाँ एक बीमारी के कारण शारीरिक मृत्यु से पहले कई बार वे मानसिक तौर पर मृत्यु का अनुभव करते हैं। यह कैन्सर का सबसे बुरा स्वरूप है जिसने हमारी मानसिकता में अपनी जड़ें जमा ली है।
पर, दिव्यांश आत्मन के मामले में ऐसा नहीं हुआ। प्रतिकूल परिस्थितियों में दिव्यांश धैर्य, साहस और दृढ़प्रतिज्ञता का प्रतिरूप था। उसकी जीवन-यात्रा हमें बताती है कि किस प्रकार जब आप संकट से चतुर्दिश घिरे हों और सारे रास्ते बंद होते दिख रहे हों, तब भी उम्मीद की लौ थाम कर आगे का रास्ता तलाशा जा सकता है। उसने एक विराट और सार्थक जीवन जिया, जिसने उसके संपर्क में आए अनेकों लोगों के जीवन को अर्थपूर्ण रूप से प्रभावित किया।
‘ब्लेज़’ दिव्यांश के इस प्रेरणादायी जीवन और उसके साथ -साथ उसकी माँ के मातृत्व के सतत विकास की कहानी प्रस्तुत करने का एक प्रयास है। उसकी एक कविता रीबर्थ की कुछ पंक्तियाँ इस प्रयास को प्रतिबिंबित करती हैं:
समय के तुंग शिखर पर खड़े होकर जाना मैंने क्षणभंगुरता को जैसा वह है अपनी प्रकृति में सदैव
‘सही मायने में प्रेरणा देने वाली और दिल को छूने वाली कहानी…..’ सचिन तेंदुलकर, प्रसिद्ध पूर्व-क्रिकेटर
‘वे सारे माता- पिता जिन्होंने अपने बेटे या बेटी को खोया है, उनके लिए यह किताब उस अपार दुख के पार जीवन की आशा लेकर आएगी, वह भी उदासी नहीं विस्मय से भरी।‘ प्रितीश नंदी, कवि, पत्रकार और ख्यातिप्राप्त मीडियाकर्मी
‘इस किताब को समाप्त करते हुए जो भाव मेरे अंदर गूंज उठे, वे ये थे कि इंसानी हौसला कितना अद्भुत हो सकता है……’ फ़रहान अख़्तर, फिल्म अभिनेता
‘दिव्यांश की यात्रा ताक़त, साहस, और सतत अन्वेषण की यात्रा थी।‘ सुधा मूर्ति, ख्यातिप्राप्त लेखिका, और चेयरपर्सन, इनफ़ोसिस फाउंडेशन
‘दिल की अतल गहराई को छू लेने वाली दास्तान …….’ ख़ालिद मोहम्मद, पत्रकार और फिल्म-पटकथा-लेखक और निर्देशक
About the Author
निधि पोद्दार ने इस कथा के नायक, अपने साहसी और प्रेरणास्पद पुत्र, दिव्यांश आत्मन के पालन -पोषण के क्रम में अनगिनत मुश्किल चुनौतियों का सामना करते हुए अद्भुत मानसिक दृढ़ता का परिचय दिया। इन्हीं मुश्किल चुनौतियों ने आख़िरकार एक गृहिणी को इस पुस्तक का लेखक बना दिया। निधि ने साल 1994 में पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक किया। वे सुशील पोद्दार की पत्नी हैं और इनकी एक बेटी भी है, अनन्या।
सुशील पोद्दार भारत सरकार में एक वरिष्ठ पद पर हैं और पिछले 28 सालों से अपने विभाग में सेवारत हैं। उन्होंने आई.एस.एम.(आई.आई.टी.), धनबाद से साल 1989 में ‘बी. टेक.’ किया। खनन -उद्योग में पाँच साल कार्य करने के उपरांत वे साल 1994 में भारतीय सिविल सेवा में शामिल हुए।
अनुवादक सुनील झा, हिंदी के कवि हैं, और वे इस पुस्तक के लेखकों के घनिष्ठ मित्र भी हैं। पेश से वे भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी हैं। उनकी एक कविता संग्रह “धूप चांदनी और स्याह रंग” हाल ही में प्रकाशित हुई है।